Soham Mantra
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SOHAM MANTRA

 सोऽहं-साधना

सोऽहंका अर्थ है- ‘मैं वह हूँ’ ‘अर्थात्आत्मावहअर्थात्परमात्मासोऽहम्शब्द में आत्मा और परमात्मा का समन्वय है, साथ ही शरीर और प्राण का भी।सोऽहम्-साधनाजितनी सरल है, बन्धन रहित है, उतनी ही महत्वपूर्ण भी है। उच्चस्तरीय साधनाओं मेंसोऽहम्-साधनाको सर्वोपरि माना गया है, क्योंकि उसके साथ जो संकल्प जुड़ा हुआ है, वह चेतना को उच्चतम स्तर तक जाग्रत कर देने में, जीव और ब्रह्म को एकाकार कर देने में विशेष रुप से समर्थ है। इतनी इस स्तर की भाव संवेदना और किसी साधना में नहीं है। अस्तु, इसे सामान्य साधनाओं की पंक्ति में रखकर स्वतंत्र नाम दिया गया है। इसेहंसयोगभी कहा गया है। जीवात्मा सहज स्वभाव में सोऽहम् का जाप श्वाँस-प्रश्वाँस किया के साथ-साथ अनायास ही करता रहता है, यह संख्या चौबीस घण्टे में 21600 के लगभग हो जाती है। गोरक्ष-संहिता के अनुसार यह जीवहकारकी ध्वनि से बाहर आता है, औरसकारकी ध्वनि से भीतर जाता है। इस प्रकार वह सदा हंस-हंस जाप करता रहता है। इस तरह एक दिन-रात में जीव इक्कीस हजार छः सौ मन्त्र का जाप करता रहता है। संस्कृत व्याकरण के आधार परसोऽहम्का संक्षिप्त रुपओऽम्हो जाता है। सोऽहम् पद में से सकार और हकार का लोप करके शेष का सन्धि योजन करने से वह प्रणव (ॐकार) रूप हो जाता है।

सोऽहम्साधना गायत्री की योग-साधना है। यह साधना व्यक्ति के श्वास लेते-निकालते समय स्वतः होती रहती है। श्वास बाहर निकालते समयहकारकी ध्वनि और भीतर ग्रहण करते समयसकारकी ध्वनि होती है, विद्वान लोग इसी कोसोऽहम्साधना कहते है।

इस साधना की दूसरी प्रेरणा जीवात्मा और ब्रह्म कि तथा आत्मा और परमात्मा की तात्त्विक एकता का भी प्रतिपादन करती है।सोअर्थात्वह अहम् अर्थात् मैं। इन दोनों का मिला-जुला निष्कर्ष निकला- वह मैं हूँ। वह अर्थात् परमात्मा, मैं अर्थात्जीवात्मादोनो का समन्वय-एकीभाव-सोऽहम्। इससे आत्मा और परमात्मा एक है- इस अद्वैत सिद्धान्त का समर्थन होता है।तत्त्वमसि’, अयमात्मा ब्रह्म, शिवोऽहम्, सच्चिदानन्दोऽहम्- जैसे वाक्यों में इसी का प्रतिपादन हैं।

सोऽहम् साधनाकोअजपा-जपअथवा प्राण-गायत्री भी कहा गया है। इसको अजपा-जाप इसलिए कहा गया है, क्योंकि यह जाप अपने आप होता रहता है। इसको जपने की नहीं बल्कि सुनने की आवश्यक्ता है। साथ ही इसको प्राण-गायत्री इसलिए कहा गया है क्योंकि यह जाप प्रत्येक श्वांस के साथ स्वतः ही होता रहता है।

अजपा गायत्री योगियों को मोक्ष प्रदान करने वाली है। उसका विज्ञान जानने से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। इसके समान और कोई विद्या नहीं है। इसके बराबर और कोई पुण्य भूतकाल में हुआ है भविष्य में ही होगा।

सोऽहम् को सद्ज्ञान, तत्वज्ञान, ब्रह्मज्ञान कहा गया है। इसमें आत्मा को अपनी वास्तविक स्थिति समझने, अनुभव करने का संकेत है।वह परमात्मा मैं ही हूँ’, इस तत्त्वज्ञान में मायामुक्ति स्थिति की शर्त जुड़ी हुई है। नर-किट, नर-पशु और नर-पिशाच जैसी निकृष्ट परिस्थितियों में घिरीअहंताके लिए इस पुनीत शब्द का प्रयोग नहीं हो सकता। ऐसे तो रावण, कंस, हिरण्यकश्यप जैसे अहंकारग्रस्त आतताई लोगों के मुख से अपने को ईश्वर कहलाने के लिए बाधित करते थे। अहंकार-उन्मत मनःस्थिति में वे अपने को वैसा समझते भी थे, पर इससे बना क्या? उनका अहंकार ही उन्हें ले डूबा।

सोऽहम्साधना में पंचतत्वों और तीन गुणों से बने शरीर को ईश्वर मानने के लिए नहीं कहा गया है। ऐसी मान्यता तो उल्टा अहंकार जगा देगी और उत्थान के स्थान पर पतन का नया कारण बनेगी, यह दिव्य संकेत आत्मा के शुद्ध स्वरूप का विवेचन है। वह वस्तुतः ईश्वर का अंश हैं। समुद्र और लहरों की, सूर्य और किरणों की मटाकाश और घटाकाश की, ब्रह्माण्ड और पिण्ड की, आग-चिंगारी की उपमा देकर परमात्मा और आत्मा की एकता का प्रतिपादन करते हुए मनीषियों ने यही कहा है कि मल-आवरण विक्षेपों से, कषाय-कल्मषों से मुक्त हुआ जीव वस्तुतः ब्रह्म ही है। दोनों की एकता में व्यवधान मात्र अज्ञान का है, यह अज्ञान ही अहंता के रूप में विकसित होता है और संकीर्ण स्वार्थपरता में निमग्न होकर व्यर्थ चिन्तन तथा अनर्थ कार्य में निरत रहकर अपनी दुर्गति अपने आप बनाता है।

तत्त्वमसि, अयमात्मा ब्रह्म, शिवोहम् सच्चिदानन्दोहम्, शुद्धोसि, बुद्धोसि, निरंजनोसि

जैसे वाक्यों में इसी दर्शन का प्रतिपादन है, उनमें जीव और ब्रह्म की तात्विक एकता का प्रतिपादन है।

सोऽहम् शब्द का निरन्तर जाप करने से उसका एक शब्द चक्र बन जाता है, जो उलट करहंसके समान प्रतिध्वनित होता है। योग-रसायन में कहा गया है, हंसो-हंसो इस पुनरावर्तित क्रम से जप करते रहने पर शीघ्र हीसोहं-सोहंऐसा जाप होने लगता है। अभ्यास के अनन्तर चलते, बैठते और सोते समय भी हंस-मंत्र का चिंतन परम् सिद्धिदायक है। इसे हीहंस’, ‘हंसो’, ‘सोऽहम्मंत्र कहते है।

जब मन उस हंस तत्व में लीन हो जाता है, तो मन के संकल्प-विकल्प समाप्त हो जाता हैं और शक्ति रुप, ज्योती रुप, शुद्ध-बुद्ध, नित्य-निरंजन ब्रह्म का प्रकाश प्रकाशित होता है। समस्त देवताओं के बीचहंसही परमेश्वर है, हंस ही परम वाक्य है, हंस ही वेदों का सार है, हंस परम रुद्र है, हंस ही परात्पर ब्रह्म है।

समस्त देवों के बीच हंस अनुपम ज्योति बन कर विद्यमान है।

सदा तन्मयतापूर्वक हंस मन्त्र का जप निर्मल प्रकाश का ध्यान करते हुए करना चाहिए।

जो अमृत से अभिसिंचन करते हुएहंसतत्त्व का जाप करता है, उसे सिद्धियों और विभूतियों की प्राप्ति होती है।

जोहंसतत्त्व की साधना करता है, वह त्रिदेव रुप है। सर्वव्यापी भगवान को जान ही लेता है।

शिव स्वरोदय के अनुसारः- श्वाँस के निकलने मेंहकारऔर प्रविष्ट होने मेंसकारजैसी ध्वनी होती है।हकारशिवरुप औरसकारशक्ति रुप कहलाता है।

प्रसंग आता है कि एक बार पार्वती जी ने भगवान् शंकर से सभी प्रकार की सिद्धियों को प्रदान करने वाले योग के विषय में पूछा, तो भगवान् शंकर ने इसका उत्तर देते हुए पार्वती जी से कहा- अजपा नाम की गायत्री योगियों को मोक्ष प्रदान करने वाली है। इसके संकल्प मात्र से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। यह सुनकर पार्वती जी को इस विषय में और अधिक जानने की इच्छा हुई। इसके सम्पूर्ण विधि-विधान को जानना चाहा। तब भगवान शंकर ने पुनः कहा-हे देवी, यह देह (शरीर) ही देवालय है। जिसमें देव प्रतिमा स्वरुप जीव विद्यमान है। इसलिए अज्ञान रुपी निर्माल्य (पुराने फ़ूल-मालाओं) को त्याग करसोऽहम्भाव से उस (देव) की आराधना करनी चाहिए।

देवी भागवत के अनुसार- हंसयोग में सभी देवताओं का समावेश है, अर्थात् ब्रह्य, विष्णु, महेश, गणेशमय हंसयोग है। हंस ही गुरु है, हंस ही जीव-ब्रह्म अर्थात् आत्मा-परमात्मा है।

सोऽहम् साधना में आत्मबोध, तत्त्वबोध का मिश्रित समावेश है। मैं कौन हूँ? उत्तर- ‘परमात्मा इसे जीव और ईश्वर का मिलना, आत्म-दर्शन, ब्रह्म-दर्शन भी कह सकते है और आत्मा परमात्मा की एकता भी। यही ब्रह्म-ज्ञान है। ब्रह्म-ज्ञान के उदय होने पर ही आत्म-ज्ञान, सद्ज्ञान, तत्त्व-ज्ञान, व्यवहार-ज्ञान आदि सभी की शाखाएँ-प्रशाखाएँ फ़ूटने लगती है।

साँस खींचते समयसोकी, रोकते समयकी और निकालते समयहम्की सूक्ष्म ध्वनि को सुनने का प्रयास करना हीसोऽहम्साधना है। इसे किसी भी स्थिति में, किसी भी समय किया जा सकता है। जब भी अवकाश हो, उतनी ही देर इस अभ्यास क्रम को चलाया जा सकता है। यों शुद्ध शरीर, शान्त मन और एकान्त स्थान और कोलाहल रहित वातावरण में कोई भी साधना करने पर उसका प्रतिफ़ल अधिक श्रेयस्कर होता है, अधिक सफ़ल रहता है।

सोऽहम्साधना का चमत्कारी परिणाम भी अतुल है। यह प्राण-योगसोऽहम्साधना का चमत्कारी परिणाम भी अतुल है। यह प्राण-योग की विशिष्ट साधना है।

दस प्रधान और चौवन(54) गौण, कुल चौंसठ(64) प्राणायामों का विधि-विधान साधना-विज्ञान के अन्तर्गत आता है। इनकें विविध लाभ हैं। इन सभी प्राणायामों मेंसोऽहम्साधना रुपी प्राण-योग सर्वोपरि है। यह अजपा-गायत्री जप, प्राण-योग के अनेक साधना-विधानों में सर्वोच्च है। इस एक के ही द्वारा सभी प्रणायामों का लाभ प्राप्त हो सकता है।

सोऽहम् और कुण्डलिनी शक्ति

षटचक्र भेदन में प्राण्तत्त्व का ही उपयोग होता है। नासिका द्वारा प्राण तत्त्व में जाने पर आज्ञाचक्र तक तो एक ही ढंग से कार्य चलता है, पर पीछे उसके भावपरक तथा शक्तिपरक ये दो भाग हो जाते हैं। भावपरक हिस्से में फ़ेंफ़ड़े में पहुँचा हुआ प्राण शरीर के समस्त अंग-प्रत्यगों में समाविष्ट होकर सत् का संस्थापन और असत् का विस्थापन करता है। शक्तिपरक प्राणधारा आज्ञाचक्र से मस्तिष्क के पिछले हिस्से को स्पर्श करती हुई मेरूदण्ड में निकल जाती है, जहाँ ब्रह्मनाड़ी का महानाद है। इसी ब्रह्म-नाद में इड़ा-पिंगला दो विधुत धाराएँ प्रभावित हैं, जो मूलाधार चक्र तक जाकर सुषुम्ना-सम्मिलन के बाद लौट आती है। मेरूदण्ड स्थित ब्रह्मनाड़ी के इस महानाद में ही षटचक्र भँवर की तरह स्थित है। इन्हीं षटचक्रों में लोक-लोकान्तरों से सम्बन्ध जोड़ने वाली रहस्यमय कुन्जियाँ सुरक्षित रखी हुई हैं। जो जितने रत्न-भण्डारों से सम्बन्ध स्थापित कर ले, वह उतना ही महान।

कुण्डलिनी शक्ति भौतिक एवं आत्मिक शक्तियों की आधारपीठ है। उसका जागरण षटचक्र भेदन द्वारा ही सम्भव है। चक्र-भेदन प्राणतत्त्व पर आधिपत्य के बिना सम्भव नहीं है। प्राणतत्त्व के नियन्त्रण में सहायक प्राणायामों में सोऽहम् का प्राणयोग सर्वश्रेष्ठ सहज है।

सोऽहम् साधना द्वारा एक अन्य लाभ है- दिव्य गन्धों की अनुभूति। गन्ध वायु तत्त्व की तन्मात्रा है। इन तन्मात्रा द्वारा देवतत्त्वों की अनुभूति होती है। नासिका सोऽहम् साधना के समय गन्ध तन्मात्रा को विकसित करती है, परिणामस्वरूप दिक्गन्धों की अनायास अनुभूति समय-समय पर होती रहती है। इन गन्धों को कुतूहल या मनोविनोद की दृष्टि से नहीं लेना चाहिए। अपितु इनमें सन्निहित विभूतियों का उपयोग कर दिव्य शक्तियों की प्राप्ति का प्रयास किया जाना चाहिए। उपासना स्थल में धूपबती जलाकर, गुलदस्ता सजाकर, चन्दन, कपूर आदि के लेपन या इत्र-गुलाब जल के छिड़काव द्वारा सुगन्ध पैदा की जाती है और उपासना अवधि में उसी की अनुभूति गहरी होती चले तो साधना-स्थल से बाहर निकलने पर, बिना किसी गन्ध-उपकरण के भी दिक्गन्ध आती रहेगी। ऐसी दिक्गन्ध एकाग्रता की अभिरूचि का चिन्ह है। विभिन्न पशु-पक्षियों, कीड़े-मकोड़ों में घ्राण-शक्ति का महत्व सर्वविदित है। उसी के सहारे वे रास्ता ढूँढ़ते है, शत्रु को भाँपते और सुरक्षा का प्रबन्ध करते, प्रणय-सहचर को आमंत्रित करते, भोजन की खोज करते तथा मौसम की जानकारी प्राप्त करते है। इसी घ्राण-शक्ति के आधार पर प्रशिक्षित कुत्ते अपराधियों को ढूँढ़ निकालते हैं। मनुष्य अपनी घ्राण-शक्ति को विकसित कर अतीन्द्रिय संकेतों तथा अविज्ञात गतिविधियों को समझ सकते हैं। दिव्य-शक्तियों से सम्बन्ध का भी गन्धानुभूति एक महत्वपूर्ण माध्यम है। सोऽहम् साधना इसी शक्ति को विकसित करती है।

सोऽहम् साधना विधान

साधना करते समय जब साँस भीतर जा रही हो तबसोकी भावना, भीतर रूक रही हो तबका और जब उसे बाहर निकाला जा रहा हो तबहम्ध्वनि का ध्यान करना चाहिए। इन शब्दों को मुख से बोलने की आवश्यकता नहीं है। मात्र श्वांस के आवागमन पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है और साथ ही यह भावना की जाती है कि आवागमन के साथ दोनों शब्दों की ध्वनि हो रही है।

आरम्भ में कुछ समय यह अनुभूति उतनी स्पष्ट नहीं होती, किन्तु प्रयास जारी रखने पर कुछ ही समय उपरान्त इस प्रकार का ध्वनि प्रवाह अनुभव में आने लगता है और उसे सुनने में केवल चित्त ही एकाग्र होता है, वरन् आनन्द का अनुभव होता है।

ध्यान से मन का बिखराव दूर होता है और प्रकृति को एक केन्द्र पर केन्द्रित करने से उससे एक विशेष मानसिक शक्ति उत्पन्न होती है। उससे जिस भी प्रयोजन के लिए- जिस भी केन्द्र पर केन्द्रित किया जाये, उसमें जाग्रति- स्फुरणा उत्पन्न होती है। मस्तिष्कीय प्रसुप्त क्षमताओं को, षट्चक्रों को, तीन ग्रन्थियों को, जिस भी केंद्र पर केन्द्रित किया जाय वहीं सजग हो उठता है और उसके अन्तर्गत जिन सिद्धियों का समावेश है, उसमें तेजस्विता आती है।

सोऽहम् साधना के लिए किसी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं है। समय का, स्थान का। स्नान जैसा भी कोई प्रतिबन्ध नहीं है। जब भी अवकाश हो, सुविधा हो, भाग-दौड़ का काम हो, मस्तिष्क चिन्ताओं से खाली हो। तभी इसे आरम्भ कर सकते है। यों हर उपासना के लिए स्वच्छता, नियत समय, स्थिर मन के नियम हैं। धूप-दीप से वातावरण को प्रसन्नतादायक बनाने की विधि है। वे अगर सुविधापूर्वक बन सकें तो श्रेष्ठ अन्यथा रात्रि को आँख खुलने पर बिस्तर पर लेटे-लेटे भी इसे किया जा सकता है। यों मेरूदण्ड को सीधा रखकर पद्मासन से बैठना हर साधना में उपयुक्त माना जाता है, पर इस साधना में उन सबका अनिवार्य प्रतिबन्ध नहीं है।

एकाग्रता के लिए हर साँस पर ध्यान और उससे भी गहराई में उतरकर सूक्ष्म ध्वनि का श्रवण इन दो प्रयोजनों के अतिरिक्त तीसरा भाव पक्ष है, जिसमें यह अनुभूति जुड़ी हुई है किमैं वह हूँअर्थात् आत्मा, परमात्मा के साथ एकीभूत हो रही है। इसके निमित्त वह सच्चे मन से आत्म-समर्पण कर रही है। यह समर्पण इतना गहरा है कि, दोनों के मिलने से एक की सत्ता मिट जाती है और दूसरे की रह जाती है। दीपक जलता है तो लौ ही दृष्टिगोचर होती है। तेल तो नीचे पेंदे में पड़ा अपनी सत्ता बत्ती के माध्यम से प्रकाश रूप में ही समाप्त करता चला जाता है।

  Gurur Brahmaa Gurur Vishnu,

Gurur Devo Maheswara,

Gurur Saaksaat Param Brahma,

Tasmai Shri Guruve Namaha.

MEANING:

"Guru Is Brahmaa (Who plants the qualities of goodness),

Guru Is Vishnu (Who nurtures and fosters the qualities of goodness),

Guru Is Maheswara (Who weeds out the bad quality),

Guru Is Supreme Brahman Itself,

Prostration Unto That Guru".

 

 

 सोऽहं साधना (अजपा-जाप) आत्मा के सूक्ष्म अन्तराल में अपने आप के सम्बन्ध में पूर्ण ज्ञान मौजूद है। वह अपनी स्थिति की घोषणा प्रत्येक क्षण करती रहती है ताकि बुद्धि भ्रमित हो और अपने स्वरूप को भूले। थोड़ा सा ध्यान देने पर आत्मा की इस घोषणा को हम स्पष्ट रूप से सुन सकते हैं। उस ध्वनि पर निरन्तर ध्यान दिया जाए तो उस घोषणा के करने वाले अमृत भण्डार आत्मा तक भी पहुँचा जा सकता है।

जब एक साँस लेते हैं तो वायु प्रवेश के साथ-साथ एक सूक्ष्म ध्वनि होती है जिसका शब्दसो .ऽऽऽ...’ जैसा होता है। जितनी देर साँस भीतर ठहरती है अर्थात् स्वाभाविक कुम्भक होता है, उतनी देर आधे ऽऽऽकी सी विराम ध्वनि होती है और जब साँस बाहर निकलती है तोहं....’ जैसी ध्वनि निकलती है। इन तीनों ध्वनियों पर ध्यान केन्द्रित करने से अजपा-जाप कीसोऽहंसाधना होने लगती है।

प्रात:काल सूर्योदय से पूर्व नित्यकर्म से निपटकर पूर्व को मुख करके किसी शान्त स्थान पर बैठिए। मेरुदण्ड सीधा रहे। दोनों हाथों को समेटकर गोदी में रख लीजिए, नेत्र बन्द कर रखिये। जब नासिका द्वारा वायु भीतर प्रवेश करने लगे, तो सूक्ष्म कर्णेन्द्रिय को सजग करके ध्यानपूर्वक अवलोकन कीजिए कि वायु के साथ-साथसोकी सूक्ष्म ध्वनि हो रही है। इसी प्रकार जितनी देर साँस रुकेऔर वायु निकलते समयहंकी ध्वनि पर ध्यान केन्द्रित कीजिए। साथ ही हृदय स्थित सूर्य-चक्र के प्रकाश बिन्दु में आत्मा के तेजोमय स्फुल्लिंग की धारणा कीजिए। जब साँस भीतर जा रही हो औरसोकी ध्वनि हो रही हो, तब अनुभव कीजिए कि यह तेज बिन्दु परमात्मा का प्रकाश है।अर्थात् परमात्मा, ‘ऽहम्अर्थात् मैं। जब वायु बाहर निकले औरहंकी ध्वनि हो, तब उसी प्रकाश-बिन्दु में भावना कीजिए कियह मैं हूँ।

की विराम भावना परिवर्तन के अवकाश का प्रतीक है। आरम्भ में उस हृदय चक्र स्थित बिन्दु कोसोध्वनि के समय ब्रह्म माना जाता है और पीछे उसी कीहंधारणा में जीव भावना हो जाती है। इस भाव परिवर्तन के लिएका अवकाश काल रखा गया है। इसी प्रकार जबहंसमाप्त हो जाए, वायु बाहर निकल जाए और नयी वायु प्रवेश करे, उस समय भी जीवभाव हटाकर उस तेज बिन्दु में ब्रह्मभाव बदलने का अवकाश मिल जाता है। यह दोनों ही अवकाशअऽऽऽके समान हैं, पर इनकी ध्वनि सुनाई नहीं देती। शब्द तोसो’ ‘ऽहंका ही होता है।

सोब्रह्म का ही प्रतिबिम्ब है, ‘प्रकृति का प्रतिनिधि है, ‘हंजीव का प्रतीक है। ब्रह्म, प्रकृति और जीव का सम्मिलन इस अजपा-जाप में होता है। सोऽहं साधना में तीनों महाकारण एकत्रित हो जाते हैं, जिनके कारण आत्म-जागरण का स्वर्ण सुयोग एक साथ ही उपलब्ध होने लगता है।

सोऽहंसाधना की उन्नति जैसे-जैसे होती जाती है, वैसे ही वैसे विज्ञानमय कोश का परिष्कार होता जाता है। आत्म-ज्ञान बढ़ता है और धीरे-धीरे आत्म-साक्षात्कार की स्थिति निकट आती चलती है। आगे चलकर साँस पर ध्यान जमाना छूट जाता है और केवल हृदय स्थित सूर्य-चक्र में विशुद्ध ब्रह्मतेज के ही दर्शन होते हैं। उस समय समाधि की सी अवस्था हो जाती है। हंसयोग की परिपक्वता से साधक ब्राह्मी स्थिति का अधिकारी हो जाता है।

स्वामी विवेकानन्द जी ने विज्ञानमय कोश की साधना के लिएआत्मानुभूतिकी विधि बताई है। उनके अमेरिकन शिष्य रामाचरक ने इस विधि कोमेण्टल डेवलपमेण्टनामक पुस्तक में विस्तारपूर्वक लिखा है।

 

 

आत्मानुभूति योग

१— किसी शान्त या एकान्त स्थान में जाइए। निर्जन, कोलाहल रहित स्थान इस साधना के लिए चुनना चाहिए। इस प्रकार का एक स्थान घर का स्वच्छ हवादार कमरा भी हो सकता है और नदी तट अथवा उपवन भी। हाथ-मुँह धोकर साधना के लिए बैठना चाहिए। आरामकुर्सी पर अथवा दीवार, वृक्ष या मसनद के सहारे बैठकर भी यह साधना भली प्रकार होती है।

सुविधापूर्वक बैठ जाइए, तीन लम्बे-लम्बे श्वास लीजिए। पेट में भरी हुई वायु को पूर्ण रूप से बाहर निकालना और फेफड़ों में पूरी हवा भरना एक पूरा श्वास कहलाता है। तीन पूरे श्वास लेने से हृदय और फुफ्फुस की भी उसी प्रकार एक धार्मिक शुद्धि होती है जैसे स्नान करने, हाथ-पाँव धोकर बैठने से शरीर की शुद्धि होती है।

तीन पूरे श्वास लेने के बाद शरीर को शिथिल कीजिए और ‘हर अंग में से खिंचकर प्राणशक्ति हृदय में एकत्रित हो रही है’ ऐसा ध्यान कीजिए। ‘हाथ, पाँव आदि सभी अंग-प्रत्यंग शिथिल, ढीले, निर्जीव, निष्प्राण हो गए हैं। मस्तिष्क से सब विचारधाराएँ और कल्पनाएँ शान्त हो गई हैं और समस्त शरीर के अन्दर एक शान्त नीला आकाश व्याप्त हो रहा है’ ऐसी भावना करनी चाहिए। ऐसी शान्त, शिथिल अवस्था को प्राप्त करने के लिए कुछ दिन लगातार प्रयत्न करना पड़ता है। अभ्यास से कुछ दिन में अधिक शिथिलता एवं शान्ति अनुभव होती जाती है।

शरीर भली प्रकार शिथिल हो जाने पर हृदय स्थान में एकत्रित अँगूठे के बराबर, शुभ्र, श्वेत ज्योति स्वरूप प्राणशक्ति का ध्यान करना चाहिए। ‘अजर, अमर, शुद्ध, बुद्ध, चेतन, पवित्र ईश्वरीय अंश आत्मा मैं हूँ। मेरा वास्तविक स्वरूप यही है, मैं सत्, चित्, आनन्द स्वरूप आत्मा हूँ।’ उस ज्योति के कल्पना नेत्रों से दर्शन करते हुए उपरोक्त भावनाएँ मन में रखनी चाहिए।

उपर्युक्त शिथिलासन के साथ आत्मदर्शन करने की साधना इस योग में प्रथम साधना है। जब यह साधना भली प्रकार अभ्यास में आ जाए तो आगे की सीढ़ी पर पैर रखना चाहिए। दूसरी भूमिका में साधना का अभ्यास नीचे दिया जाता है।

२— ऊपर लिखी हुई शिथिलावस्था में अखिल आकाश में नील वर्ण आकाश का ध्यान कीजिए। उस आकाश में बहुत ऊपर सूर्य के समान ज्योति-स्वरूप आत्मा को अवस्थित देखिए। ‘मैं ही यह प्रकाशवान् आत्मा हूँ’ ऐसा निश्चित संकल्प कीजिए। अपने शरीर को नीचे भूतल पर निस्पन्द अवस्था में पड़ा हुआ देखिए, उसके अंग-प्रत्यंगों का निरीक्षण एवं परीक्षण कीजिए। ‘यह हर एक कल-पुर्जा मेरा औजार है, मेरा वस्त्र है। यह यन्त्र मेरी इच्छानुसार क्रिया करने के लिए प्राप्त हुआ है।’ इस बात को बार-बार मन में दुहराइए। इस निस्पन्द शरीर में खोपड़ी का ढक्कन उठाकर ध्यानावस्था से मन और बुद्धि को दो सेवक शक्तियों के रूप में देखिए। वे दोनों हाथ बाँधे आपकी इच्छानुसार कार्य करने के लिए नतमस्तक खड़े हैं। इस शरीर और मन बुद्धि को देखकर प्रसन्न होइए कि ‘इच्छानुसार कार्य करने के लिए यह मुझे प्राप्त हुए हैं। मैं इनका उपयोग सच्चे आत्म-स्वार्थ के लिए ही करूँगा।’ यह भावनाएँ बराबर उस ध्यानावस्था में आपके मन में गूँजती रहनी चाहिए।

४.जब दूसरी भूमिका का ध्यान भली प्रकार होने लगे तो तीसरी भूमिका का ध्यान कीजिए।

अपने को सूर्य की स्थिति में ऊपर आकाश में अवस्थित देखिए— ‘‘मैं समस्त भूमण्डल पर अपनी प्रकाश किरणें फेंक रहा हूँ। संसार मेरा कर्मक्षेत्र और लीलाभूमि है। भूतल की वस्तुओं और शक्तियों को मैं इच्छित प्रयोजनों के लिए काम में लाता हूँ, पर वे मेरे ऊपर प्रभाव नहीं डाल सकतीं। पंचभूतों की गतिविधि के कारण जो हलचलें संसार में हर घड़ी होती हैं, वे मेरे लिए एक विनोद और मनोरंजक दृश्य मात्र हैं। मैं किसी भी सांसारिक हानि-लाभ से प्रभावित नहीं होता। मैं शुद्ध, चैतन्य, सत्यस्वरूप, पवित्र, निर्लेप, अविनाशी आत्मा हूँ। मै आत्मा हूँ, महान् आत्मा हूँ।महान् परमात्मा का विशुद्ध स्फुलिंग हूँ।“यह मन्त्र मन ही मन जपिए।

तीसरी भूमिका का ध्यान जब अभ्यास के कारण पूर्ण रूप से पुष्ट हो जाए और हर घड़ी वह भावना रोम-रोम में प्रतिभासित होने लगे, तो समझना चाहिए कि इस साधना की सिद्धावस्था प्राप्त हो गई। यह जाग्रत् समाधि या जीवन -मुक्त अवस्था कहलाती है।

 

 

 

 

आत्मचिन्तन की साधना प्रथम साधना:—

रात को सब कार्यों से निवृत्त होकर जब सोने का समय हो, तो सीधे चित लेट जाइए। पैर सीधे फैला दीजिए, हाथों को मोड़कर पेट पर रख लीजिए। सिर सीधा रहे। पास में दीपक जल रहा हो तो बुझा दीजिए या मन्द कर दीजिए। नेत्रों को अधखुला रखिए।

अनुभव कीजिए कि आपका आज का एक दिन, एक जीवन था। अब जबकि एक दिन समाप्त हो रहा है, तो एक जीवन की इतिश्री हो रही है। निद्रा एक मृत्यु है। अब इस घड़ी में एक दैनिक जीवन को समाप्त करके मृत्यु की गोद में जा रहा हूँ।

आज के जीवन की आध्यात्मिक दृष्टि से समालोचना कीजिए। प्रात:काल से लेकर सोते समय तक के कार्यों पर दृष्टिपात कीजिए। मुझ आत्मा के लिए वह कार्य उचित था या अनुचित? यह उचित था, तो जितनी सावधानी एवं शक्ति के साथ उसे करना चाहिए था, उसके अनुसार किया या नहीं? बहुमूल्य समय का कितना भाग उचित रीति से, कितना अनुचित रीति से, कितना निरर्थक रीति से व्यतीत किया? वह दैनिक जीवन सफल रहा या असफल? आत्मिक पूँजी में लाभ हुआ या घाटा? सद्वृत्तियाँ प्रधान रहीं या असद्वृत्तियाँ? इस प्रकार के प्रश्नों के साथ दिनभर के कार्यों का भी निरीक्षण कीजिए।

जितना अनुचित हुआ हो, उसके लिए आत्मदेव के सम्मुख पश्चात्ताप कीजिए। जो उचित हुआ हो उसके लिए परमात्मा को धन्यवाद दीजिए और प्रार्थना कीजिए कि आगामी जीवन में, कल के जीवन में, उस दिशा में विशेष रूप से अग्रसर करें। इसके पश्चात् शुभ्र वर्ण आत्म-ज्योति का ध्यान करते हुए निद्रा देवी की गोद में सुखपूर्वक चले जाइए।

द्वितीय साधना :-

प्रात:काल जब नींद पूरी तरह खुल जाए तो अँगड़ाई लीजिए। तीन पूरे लम्बे श्वास खींचकर सचेत हो जाइए। भावना कीजिए कि आज नया जीवन ग्रहण कर रहा हूँ। नया जन्म धारण करता हूँ। इस जन्म को इस प्रकार खर्च करूँगा कि आत्मिक पूँजी में अभिवृद्धि हो। कल के दिन-पिछले दिन जो भूलें हुई थीं, आत्म-देव के सामने जो पश्चात्ताप किया था, उसका ध्यान रखता हुआ आज के दिन का अधिक उत्तमता के साथ उपयोग करूँगा।

दिनभर के कार्यक्रम की योजना बनाइए। इन कार्यों में जो खतरा सामने आने को है, उसे विचारिए और उससे बचने के लिए सावधान होइए। उन कार्यों से जो आत्मलाभ होने वाला है, वह अधिक हो, इसके लिए और तैयारी कीजिए। यह जन्म, यह दिन पिछले की अपेक्षा अधिक सफल हो, यह चुनौती अपने आप को दीजिए और उसे साहसपूर्वक स्वीकार कर लीजिए।

परमात्मा का ध्यान कीजिए और प्रसन्न मुद्रा में एक चैतन्य, ताजगी, उत्साह, आशा एवं आत्मविश्वास की भावनाओं के साथ उठकर शय्या का परित्याग कीजिए। शय्या से नीचे पैर रखना मानो आज के नवजीवन में प्रवेश करना है।

आत्म-चिन्तन की इन साधनाओं से दिन-दिन शरीराध्यास घटने लगता है। शरीर को लक्ष्य करके किए जाने वाले विचार और कार्य शिथिल होने लगते हैं तथा ऐसी विचारधारा एवं कार्य प्रणाली समुन्नत होती है, जिसके द्वारा आत्म-लाभ के लिए अनेक प्रकार के पुण्य आयोजन होते हैं।

 

 

 

स्वर योग विज्ञानमय कोश वायु प्रधान कोश होने के कारण उसकी स्थिति में वायु संस्थान विशेष रूप से सजग रहता है। इस वायु तत्त्व पर यदि अधिकार प्राप्त कर लिया जाए तो अनेक प्रकार से अपना हित सम्पादन किया जा सकता है।

स्वर शास्त्र के अनुसार श्वास-प्रश्वास के मार्गों को नाड़ी कहते हैं। शरीर में ऐसी नाड़ियों की संख्या ७२००० है। इनको सिर्फ नसें समझना चाहिए, स्पष्टत: यह प्राण-वायु आवागमन के मार्ग हैं। नाभि में इसी प्रकार की एक नाड़ी कुण्डली के आकार में है, जिसमें से () इड़ा, () पिङ्गला, () सुषुम्ना, () गान्धारी, () हस्त-जिह्वा, () पूषा, () यशश्विनी, () अलम्बुषा, () कुहू तथा (१०) शंखिनी नामक दस नाड़ियाँ निकली हैं और यह शरीर के विभिन्न भागों की ओर चली जाती हैं। इनमें से पहली तीन प्रधान हैं। इड़ा कोचन्द्रकहते हैं जो बाएँ नथुने में है। पिंगला कोसूर्य कहते हैं, यह दाहिने नथुने में है। सुषुम्ना को वायु कहते हैं जो दोनों नथुनों के मध्य में है। जिस प्रकार संसार में सूर्य और चन्द्र नियमित रूप से अपना-अपना काम करते हैं, उसी प्रकार इड़ा, पिंगला भी इस जीवन में अपना-अपना कार्य नियमित रूप से करती हैं। इन तीनों के अतिरिक्त अन्य सात प्रमुख नाड़ियों के स्थान इस प्रकार हैंगान्धारी बायीं आँख में, हस्तजिह्वा दाहिनी आँख में, पूषा दाहिने कान में, यशश्विनी बाएँ कान में, अलम्बुषा मुख में, कुहू लिंग देश में और शंखिनी गुदा (मूलाधार) में। इस प्रकार शरीर के दस द्वारों में दस नाड़ियाँ हैं।

हठयोग में नाभिकन्द अर्थात् कुण्डलिनी स्थान गुदा द्वार से लिंग देश की ओर दो अँगुल हटकर मूलाधार चक्र माना गया है। स्वर योग में वह स्थिति माननीय होगी। स्वर योग शरीर शास्त्र से सम्बन्ध रखता है और शरीर की नाभि या मध्य केन्द्र गुदा-मूल में नहीं, वरन् उदर की टुण्डी में ही हो सकता है; इसलिए यहाँनाभि देशका तात्पर्य उदर की टुण्डी मानना ही ठीक है। श्वास क्रिया का प्रत्यक्ष सम्बन्ध उदर से ही है, इसलिए प्राणायाम द्वारा उदर संस्थान तक प्राण वायु को ले जाकर नाभि केन्द्र से इस प्रकार घर्षण किया जाता है कि वहाँ की सुप्त शक्तियों का जागरण हो सके।

चन्द्र और सूर्य की अदृश्य रश्मियों का प्रभाव स्वरों पर पड़ता है। सब जानते हैं कि चन्द्रमा का गुण शीतल और सूर्य का उष्ण है। शीतलता से स्थिरता, गम्भीरता, विवेक प्रभृति गुण उत्पन्न होते हैं और उष्णता से तेज, शौर्य, चञ्चलता, उत्साह, क्रियाशीलता, बल आदि गुणों का आविर्भाव होता है। मनुष्य को सांसारिक जीवन में शान्तिपूर्ण और अशान्तिपूर्ण दोनों ही तरह के काम करने पड़ते हैं। किसी भी काम का अन्तिम परिणाम उसके आरम्भ पर निर्भर है। इसलिए विवेकी पुरुष अपने कर्मों को आरम्भ करते समय यह देख लेते हैं कि हमारे शरीर और मन की स्वाभाविक स्थिति इस प्रकार काम करने के अनुकूल है कि नहीं? एक विद्यार्थी को रात में उस समय पाठ याद करने के लिए दिया जाए जबकि उसकी स्वाभाविक स्थिति निद्रा चाहती है, तो वह पाठ को अच्छी तरह याद कर सकेगा। यदि यही पाठ उसे प्रात:काल की अनुकूल स्थिति में दिया जाए तो आसानी से सफलता मिल जाएगी। ध्यान, भजन, पूजा, मनन, चिन्तन के लिए एकान्त की आवश्यकता है, किन्तु उत्साह भरने और युद्ध के लिए कोलाहलपूर्ण वातावरण की, बाजों की घोर ध्वनि की आवश्यकता होती है। ऐसी उचित स्थितियों में किए कार्य अवश्य ही फलीभूत होते हैं। इसी दृष्टिकोण के आधार पर स्वर-योगियों ने आदेश किया है कि विवेकपूर्ण और स्थायी कार्य चन्द्र स्वर में किए जाने चाहिए; जैसेविवाह, दान, मन्दिर, कुआँ, तालाब बनाना, नवीन वस्त्र धारण करना, घर बनाना, आभूषण बनवाना, शान्ति के काम, पुष्टि के काम, शफाखाना, औषधि देना, रसायन बनाना, मैत्री, व्यापार, बीज बोना, दूर की यात्रा, विद्याभ्यास, योग क्रिया आदि। यह सब कार्य ऐसे हैं जिनमें अधिक गम्भीरता और बुद्धिपूर्वक कार्य करने की आवश्यकता है, इसलिए इनका आरम्भ भी ऐसे ही समय में होना चाहिए, जब शरीर के सूक्ष्म कोश चन्द्रमा की शीतलता को ग्रहण कर रहे हों।

उत्तेजना, आवेश एवं जोश के साथ करने पर जो कार्य ठीक होते हैं, उनके लिए सूर्य स्वर उत्तम कहा गया है; जैसेक्रूर कार्य, स्त्री-भोग, भ्रष्ट कार्य, युद्ध करना, देश का ध्वंस करना, विष खिलाना, मद्य पीना, हत्या करना, खेलना; काठ, पत्थर, पृथ्वी एवं रत्न को तोड़ना; तन्त्रविद्या, जुआ, चोरी, व्यायाम, नदी पार करना आदि। यहाँ उपर्युक्त कठोर कर्मों का समर्थन या निषेध नहीं है। शास्त्रकार ने तो एक वैज्ञानिक की तरह विश्लेषण कर दिया है कि ऐसे कार्य उस वक्त अच्छे होंगे, जब सूर्य की उष्णता के प्रभाव से जीवन तत्त्व उत्तेजित हो रहा हो। शान्तिपूर्ण मस्तिष्क से भली प्रकार ऐसे कार्यों को कोई व्यक्ति कैसे कर सकता? इसका तात्पर्य यह भी नहीं कि सूर्य स्वर में अच्छे कार्य नहीं होते। संघर्ष और युद्ध आदि कार्य देश, समाज अथवा आश्रित की रक्षार्थ भी हो सकते हैं और उनको सब कोई प्रशंसनीय बतलाता है। इसी प्रकार विशेष परिश्रम के कार्यों का सम्पादन भी समाज और परिवार के लिए अनिवार्य होता है। वे भी सूर्य स्वर में उत्तमतायुक्त होते हैं।

कुछ क्षण के लिए जब दोनों नाड़ी इड़ा, पिंगला रुककर, सुषुम्ना चलती है, तब प्राय: शरीर सन्धि अवस्था में होता है। वह सन्ध्याकाल है। दिन के उदय और अस्त को भी सन्ध्याकाल कहते हैं। इस समय जन्म या मरण काल के समान पारलौकिक भावनाएँ मनुष्य में जाग्रत् होती हैं और संसार की ओर से विरक्ति, उदासीनता एवं अरुचि होने लगती है। स्वर की सन्ध्या से भी मनुष्य का चित्त सांसारिक कार्यों से कुछ उदासीन हो जाता है और अपने वर्तमान अनुचित कार्यों पर पश्चात्ताप स्वरूप खिन्नता प्रकट करता हुआ, कुछ आत्म-चिन्तन की ओर झुकता है। वह क्रिया बहुत ही सूक्ष्म होती है, अल्पकाल के लिए आती है, इसलिए हम अच्छी तरह पहचान भी नहीं पाते। यदि इस समय परमार्थ चिन्तन और ईश्वराराधना का अभ्यास किया जाए, तो नि:सन्देह उसमें बहुत उन्नति हो सकती है; किन्तु सांसारिक कार्यों के लिए यह स्थिति उपयुक्त नहीं है, इसलिए सुषुम्ना स्वर में आरम्भ होने वाले कार्यों का परिणाम अच्छा नहीं होता, वे अक्सर अधूरे या असफल रह जाते हैं। सुषुम्ना की दशा में मानसिक विकार दब जाते हैं और गहरे आत्मिक भाव का थोड़ा बहुत उदय होता है, इसलिए इस समय में दिए हुए शाप या वरदान अधिकांश फलीभूत होते हैं, क्योंकि इन भावनाओं के साथ आत्म-तत्त्व का बहुत कुछ सम्मिश्रण होता है। इड़ा शीत ऋतु है तो पिंगला ग्रीष्म ऋतु। जिस प्रकार शीत ऋतु के महीनों में शीत की प्रधानता रहती है, उसी प्रकार चन्द्र नाड़ी शीतल होती है और ग्रीष्म ऋतु के महीनों में जिस प्रकार गर्मी की प्रधानता रहती है, उसी प्रकार सूर्य नाड़ी में उष्णता एवं उत्तेजना का प्राधान्य होता है।

स्वर बदलना

कुछ विशेष कार्यों के सम्बन्ध में स्वर शास्त्रज्ञों के जो अनुभव हैं, उनकी जानकारी सर्वसाधारण के लिए बहुत ही सुविधाजनक होगी। बताया गया है कि प्रस्थान करते समय चलित स्वर के शरीर भाग को हाथ से स्पर्श करके उस चलित स्वर वाले कदम को आगे बढ़ाकर (यदि चन्द्र नाड़ी चलती हो तो बार और सूर्य स्वर है तो बार उसी पैर को जमीन पर पटक कर) प्रस्थान करना चाहिए। यदि किसी क्रोधी पुरुष के पास जाना है तो अचलित स्वर (जो स्वर चल रहा हो) के पैर को पहले आगे बढ़ाकर प्रस्थान करना चाहिए और अचलित स्वर की ओर उस पुरुष को करके बातचीत करनी चाहिए। इसी रीति से उसकी बढ़ी हुई उष्णता को अपना अचलित स्वर की ओर का शान्त भाग अपनी आकर्षण विद्युत् से खींचकर शान्त बना देगा और मनोरथ में सिद्धि प्राप्त होगी। गुरु, मित्र, अफसर, राजदरबार से जबकि बाम स्वर चलित हो, तब वार्तालाप या कार्यारम्भ करना ठीक है।

कई बार ऐसे अवसर आते हैं, जब कार्य अत्यन्त ही आवश्यक हो सकता है, किन्तु उस समय स्वर विपरीत चलता है। तब क्या उस कार्य के किए बिना ही बैठा रहना चाहिए? नहीं, ऐसा करने की जरूरत नहीं है। जिस प्रकार जब रात को निद्रा आती है, किन्तु उस समय कुछ कार्य करना आवश्यक होता है, तब चाय आदि किसी उत्तेजक पदार्थ की सहायता से शरीर को चैतन्य करते हैं, उसी प्रकार हम कुछ उपायों द्वारा स्वर को बदल भी सकते हैं। नीचे कुछ ऐसे नियम लिखे जाते हैं

() जो स्वर नहीं चल रहा, उसे अँगूठे से दबाएँ और जिस नथुने से साँस चलती है, उससे हवा खींचें। फिर जिससे साँस खींची है, उसे दबाकर पहले नथुने से-यानी जिस स्वर को चलाना है, उससे श्वास छोड़ें। इस प्रकार कुछ देर तक बार-बार करें, श्वास की चाल बदल जायेगी।

() जिस नथुने से श्वास चल रहा हो, उसी करवट से लेट जायें, तो स्वर बदल जायेगा। इस प्रयोग के साथ पहला प्रयोग करने से स्वर और भी शीघ्र बदलता है।

() जिस तरफ का स्वर चल रहा हो, उस ओर की काँख (बगल) में कोई सख्त चीज कुछ देर दबाकर रखो तो स्वर बदल जाता है। पहले और दूसरे प्रयोग के साथ यह प्रयोग भी करने से शीघ्रता होती है।

() घी खाने से वाम स्वर और शहद खाने से दक्षिण स्वर चलना कहा जाता है।

() चलित स्वर में पुरानी स्वच्छ रूई का फाया रखने से स्वर बदलता है।

बहुधा जिस प्रकार बीमारी की दशा में शरीर को रोग-मुक्त करने के लिए चिकित्सा की जाती है, उसी प्रकार स्वर को ठीक अवस्था में लाने के लिए उन उपायों को काम में लाना चाहिए।

स्वर-संयम से दीर्घ जीवनप्रत्येक प्राणी का पूर्ण आयु प्राप्त करना, दीर्घ जीवी होना उसकी श्वास क्रिया पर अवलम्बित है। पूर्व कर्मों के अनुसार जीवित रहने के लिए परमात्मा एक नियत संख्या में श्वास प्रदान करता है, वह श्वास समाप्त होने पर प्राणान्त हो जाता है। इस खजाने को जो प्राणी जितनी होशियारी से खर्च करेगा, वह उतने ही अधिक काल तक जीवित रह सकेगा और जो जितना व्यर्थ गँवा देगा, उतनी ही शीघ्र उसकी मृत्यु हो जाएगी। सामान्यत: हर एक मनुष्य दिन-रात में २१६०० श्वास लेता है। इससे कम श्वास लेने वाला दीर्घजीवी होता है, क्योंकि अपने धन का जितना कम व्यय होगा, उतने ही अधिक काल तक वह सञ्चित रहेगा। हमारे श्वास की पूँजी की भी यही दशा है। विश्व के समस्त प्राणियों में जो जीव जितना कम श्वास लेता है, वह उतने ही अधिक काल तक जीवित रहता है। नीचे की तालिका से इसका स्पष्टीकरण हो जाता है।

स्वर योग

नाम प्राणी

श्वास की गति प्रति मिनट

   पूर्ण आयु

खरगोश

३८ बार

 वर्ष

बन्दर

३२ बार

 १० वर्ष

कुत्ता

२९ बार

११ वर्ष

घोड़ा

१९ बार

३५ वर्ष

मनुष्य

१३ बार

१२० वर्ष

साँप

 बार

१००० वर्ष

कछुआ

 बार

२००० वर्ष

 

साधारण काम-काज में १२ बार, दौड़-धूप करने में १८ बार और मैथुन करते समय ३६ बार प्रति मिनट के हिसाब से श्वास चलता है, इसलिए विषयी और लम्पट मनुष्य की आयु घट जाती है और प्राणायाम करने वाले योगाभ्यासी दीर्घकाल तक जीवित रहते हैं। यहाँ यह न सोचना चाहिए कि चुपचाप बैठे रहने से कम साँस चलती है, इसलिए निष्क्रिय बैठे रहने से आयु बढ़ जाएगी; ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि निष्क्रिय बैठे रहने से शरीर के अन्य अंग निर्बल, अशक्त और बीमार हो जायेंगे, तदनुसार उनकी साँस का वेग बहुत ही बढ़ जाएगा। इसलिए शारीरिक अंगों को स्वस्थ रखने के लिए परिश्रम करना आवश्यक है; किन्तु शक्ति के बाहर परिश्रम भी नहीं करना चाहिए।

साँस सदा पूरी और गहरी लेनी चाहिए तथा झुककर कभी न बैठना चाहिए। नाभि तक पूरी साँस लेने पर एक प्रकार से कुम्भक हो जाता है और श्वासों की संख्या कम हो जाती है। मेरुदण्ड के भीतर एक प्रकार का तरल जीवन तत्त्व प्रवाहित होता रहता है, जो सुषुम्ना को बलवान् बनाए रखता है, तदनुसार मस्तिष्क की पुष्टि होती रहती है। यदि मेरुदण्ड को झुका हुआ रखा जाए तो उस तरल तत्त्व का प्रवाह रुक जाता है और निर्बल सुषुम्ना मस्तिष्क का पोषण करने से वञ्चित रह जाती है।

सोते समय चित होकर नहीं लेटना चाहिए, इससे सुषुम्ना स्वर चलकर विघ्न पैदा होने की सम्भावना रहती है। ऐसी दशा में अशुभ तथा भयानक स्वप्न दिखाई पड़ते हैं। इसलिए भोजनोपरान्त पहले बाएँ, फिर दाहिने करवट लेटना चाहिए। भोजन के बाद कम से कम १५ मिनट आराम किए बिना यात्रा करना भी उचित नहीं है।

शीतलता से अग्नि मन्द पड़ जाती है और उष्णता से तीव्र होती है। यह प्रभाव हमारी जठराग्नि पर भी पड़ता है। सूर्य स्वर में पाचन शक्ति की वृद्धि रहती है, अतएव इसी स्वर में भोजन करना उत्तम है। इस नियम को सब लोग जानते हैं कि भोजन के उपरान्त बाएँ करवट से लेटे रहना चाहिए। उद्देश्य यही है कि बाएँ करवट लेटने से दक्षिण स्वर चलता है जिससे पाचन शक्ति प्रदीप्त होती है।

इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना की गतिविधि पर ध्यान रखने से वायु-तत्त्व पर अपना अधिकार होता है। वायु के माध्यम से कितनी ही ऐसी बातें जानी जा सकती हैं, जिन्हें साधारण लोग नहीं जानते। मकड़ी को वर्षा से बहुत पहले पता लग जाता है कि मेघ बरसने वाला है, तदनुसार वह अपनी रक्षा का प्रबन्ध पहले से ही कर लेती है। कारण यह है कि वायु के साथ वर्षा का सूक्ष्म संयोग मिला रहता है, उसे मनुष्य समझ नहीं पाता; पर मकड़ी अपनी चेतना से यह अनुभव कर लेती है कि इतने समय बाद इतने वेग से पानी बरसने वाला है। मकड़ी में जैसी सूक्ष्म वायु परीक्षण चेतना होती है, उससे भी अधिक प्रबुद्ध चेतना स्वर-योगी को मिल जाती है। वह वर्षा, गर्मी को ही नहीं वरन् उससे भी सूक्ष्म बातें, भविष्य की सम्भावनाएँ, दुर्घटनाएँ, परिवर्तनशीलताएँ, विलक्षणताएँ अपनी दिव्यदृष्टि से जान लेता है।

कई स्वर-ज्ञाता ज्योतिषियों की भाँति इस विद्या द्वारा भविष्यवक्ताओं जैसा व्यवसाय करते हैं। स्वर के आधार पर ही मूक प्रश्न, तेजी-मन्दी, खोई वस्तु का पता, शुभ-अशुभ मुहूर्त आदि बातें बताते हैं। असफल होने की आशंका वाले, दुस्साहसपूर्ण कार्य करने वाले लोग भी स्वर का आश्रय लेकर अपना काम करते हैं। चोर, डाकू आदि इस सम्बन्ध में विशेष ध्यान रखते हैं। व्यापार, राजद्वार, चिकित्सा आदि जोखिम और जिम्मेदारी के कामों में भी स्वर विद्या के नियमों का ध्यान रखा जाता है। इस सम्बन्ध में ‘अखण्ड-ज्योति पत्रिका में सगय-समय पर तद्विषयक जानकारी प्रकाशित होती रहती है। उस सुविस्तृत ज्ञान का विवेचन यहाँ नहीं हो सकता। इस समय तो हमें केवल यह विचार करना है कि स्वर साधन से विज्ञानमय कोश की सुव्यवस्था में हमें किस प्रकार सहायता मिल सकती है।

विज्ञानमय -कोश की वायु -साधना

विज्ञानमय -कोश की वायु -साधना

(१) शान्त वातावरण में मेरुदण्ड सीधा करके बैठ जाइए और नाभि -चक्र में शुभ्र ज्योतिमण्डल का ध्यान कीजिए। उस ज्योति केन्द्र में समुद्र के ज्वार-भाटे की तरह हिलोरें उठती हुई परिलक्षित होंगी।

(२) यदि बायाँ स्वर चल रहा होगा तो उस ज्योति-केन्द्र का वर्ण चन्द्रमा के समान पीला होगा और उसके बाएँ भाग से निकलने वाली इड़ा नाड़ी में होकर श्वास-प्रवाह का आगमन होगा। नाभि से नीचे की ओर मूलाधार चक्र (गुदा और लिंग का मध्यवर्ती भाग) में होती हुई मेरुदण्ड में होकर मस्तिष्क के ऊपर भाग की परिक्रमा करती हुई नासिका के बाएँ नथुने तक इड़ा नाड़ी जाती है। नाभिकेन्द्र के वाम भाग की क्रियाशीलता के कारण यह नाड़ी का काम करती है और बायाँ स्वर चलता है। इस तथ्य को भावना के दिव्य नेत्रों द्वारा भली-भाँति चित्रवत् पर्यवेक्षण कीजिए।

(३) यदि  दाहिना स्वर चल रहा होगा तो नाभिकेन्द्र का ज्योति मण्डल सूर्य के समान तनिक लालिमा लिए हुए श्वेत वर्ण का होगा और उसके दाहिने भाग में से निकलने वाली पिंगला नाड़ी में होकर श्वास-प्रश्वास की क्रिया होगी। नाभि के नीचे मूलाधार में होकर मेरुदण्ड तथा मस्तिष्क में होती हुई दाहिने नथुने तक पिंगला नाड़ी गई है। नाभि चक्र के दाहिने भाग में चैतन्यता होती है और दाहिना स्वर चलता है। इस सूक्ष्म क्रिया को ध्यान-शक्ति द्वारा ऐसे मनोयोगपूर्वक निरीक्षण करना चाहिए कि वस्तु-स्थिति ध्यान क्षेत्र में चित्र के समान स्पष्ट रूप से परिलक्षित होने लगे।

(४) जब स्वर सन्धि होती है तो नाभि चक्र स्थिर हो जाता है, उसमें कोई हलचल नहीं होती और न उतनी देर तक वायु का आवागमन होता है। इस सन्धिकाल में तीसरी नाड़ी मेरुदण्ड में अत्यन्त द्रुत वेग से बिजली के समान कौंधती है और साधारणत: एक क्षण के सौवें भाग में यह कौंध जाती है, इसे ही सुषुम्ना कहते हैं।

(५) सुषुम्ना का जो विद्युत् प्रवाह है, वही आत्मा की चञ्चल झाँकी है। आरम्भ में एक झाँकी एक हलके झपट्टे के समान किञ्चित् प्रकाश की मन्द किरण जैसी होती है। साधना से यह चमक अधिक प्रकाशवान् और अधिक देर ठहरने वाली होती है। कुछ दिनों के पश्चात वर्षाकाल में बादलों के मध्य चमकने वाली बिजली के समान उसका प्रकाश और विस्तार होने लगता है। सुषुम्ना ज्योति में किन्हीं रंगों की आभा होना, उसका सीधा, टेढ़ा, तिरछा या वर्तुलाकार होना आत्मिक स्थिति का परिचायक है। तीन गुण, पाँच तत्त्व, संस्कार एवं अन्त:करण की जैसी स्थिति होती है, उसी के अनुरूप सुषुम्ना का रूप ध्यानावस्था में दृष्टिगोचर होता है।

(६) इड़ा-पिंगला की क्रियाएँ जब स्पष्ट दीखने लगें, तब उनका साक्षी रूप से अवलोकन किया कीजिए। नाभिचक्र के जिस भाग में ज्वार-भाटा आ रहा होगा, वही स्वर चल रहा होगा और केन्द्र में इसी आधार पर सूर्य या चन्द्रमा का रंग होगा। यह क्रिया जैसे-जैसे हो रही है, उसको स्वाभाविक रीति से होते हुए देखते रहना चाहिए। एक साँस के भीतर पूरा प्रवेश होने पर जब लौटती है, तो उसे ‘आभ्यन्तर सन्धि’ और साँस पूरी तरह बाहर निकलकर नई साँस भीतर जाना जब आरम्भ करती है, तब उसे ‘बाह्य सन्धि’ कहते हैं। इन कुम्भक कालों में सुषुम्ना की द्रु्त गतिगामिनी विद्युत् आभा का अत्यन्त चपल प्रकाश विशेष सजगतापूर्वक दिव्य नेत्रों से देखना चाहिए।

(७) जब इड़ा बदलकर पिंगला में या पिंगला बदलकर  इड़ा में जाती है, अर्थात् एक स्वर जब दूसरे में परिवर्तित होता है, तो सुषुम्ना की सन्धि वेला आती है। अपने आप स्वर बदलने के अवसर पर स्वाभाविक सुषुम्ना का प्राप्त होना प्राय: कठिन होता है। इसलिए स्वर विद्या के साधक पिछले पृष्ठों में बताए गए स्वर बदलने के उपायों से वह परिवर्तन करते हैं और तब सुषुम्ना की सन्धि आने पर आत्मज्योति का दर्शन करते हैं। यह ज्योति आरम्भ में चञ्चल और विविध आकृतियों की होती है और अन्त में स्थिर एवं मण्डलाकार हो जाती है। यह स्थिरता ही विज्ञानमय कोश की सफलता है। उसी स्थिति में आत्म-साक्षात्कार होता है।

सुषुम्ना में अवस्थित होना वायु पर अपना अधिकार कर लेना है। इस सफलता के द्वारा लोक-लोकान्तरों तक अपनी पहुँच हो जाती है और विश्व-ब्रह्माण्ड पर अपना प्रभुत्व अनुभव होता है। प्राचीन समय में स्वर-शक्ति द्वारा अणिमा, महिमा, लघिमा आदि सिद्धियाँ प्राप्त होती थीं। आज के युग-प्रवाह में वैसा तो नहीं होता, पर ऐसे अनुभव होते हैं जिनसे मनुष्य शरीर रहते हुए भी मानसिक आवरण में देवतत्त्वों की प्रचुरता हो जाती है। विज्ञानमय कोश के विजयी को भूसुर, भूदेव या नर-तनुधारी दिव्य आत्मा कहते हैं।

ग्रन्थि-भेद

विज्ञानमय कोश की चतुर्थ भूमिका में पहुँचने पर जीव को प्रतीत होता है कि तीन सूक्ष्म बन्धन ही मुझे बाँधे हुए हैं। पञ्च-तत्त्वों से शरीर बना है, उस शरीर में पाँच कोश हैं। गायत्री के ये पाँच कोश ही पाँच मुख हैं। इन पाँच बन्धनों को खोलने के लिए कोशों की अलग-अलग साधनाएँ बताई गई हैं। विज्ञानमय कोश के अन्तर्गत तीन बन्धन हैं, जो पञ्च भौतिक शरीर रहने पर भी-देव, गन्धर्व, यक्ष, भूत, पिशाच आदि योनियों में भी वैसे ही बन्धन बाँधे रहते हैं जैसा कि शरीरधारी का होता है।

ये तीन बन्धन-ग्रन्थियाँ रुद्रग्रन्थि, विष्णु-ग्रन्थि, ब्रह्मग्रन्थि के नाम से प्रसिद्ध हैं। इन्हें तीन गुण भी कह सकते हैं। रुद्रग्रन्थि अर्थात् तम, विष्णुग्रन्थि अर्थात् सत्, ब्रह्मग्रन्थि अर्थात् रज। इन तीनों गुणों से अतीत हो जाने पर, ऊँचा उठ जाने पर ही आत्मा शान्ति और आनन्द का अधिकारी होता है।

इन तीन ग्रन्थियों को खोलने के महत्त्वपूर्ण कार्य को ध्यान में रखने के लिए कन्धे पर तीन तार का यज्ञोपवीत धारण किया जाता है। इसका तात्पर्य यह है कि तम, रज, सत् के तीन गुणों द्वारा स्थूल, सूक्ष्म, कारण शरीर बने हुए हैं। यज्ञोपवीत के अन्तिम भाग में तीन ग्रन्थियाँ लगाई जाती हैं। इसका तात्पर्य यह है कि रुद्रग्रन्थि, विष्णुग्रन्थि तथा ब्रह्मग्रन्थि से जीव बँधा पड़ा है। इन तीनों को खोलने की जिम्मेदारी का नाम ही पितृऋण, ऋषिऋण, देवऋण है। तम को प्रकृति, रज को जीव, सत् को आत्मा कहते हैं।

व्यावहारिक जगत् में तम को सांसारिक जीवन, रज को व्यक्तिगत जीवन, सत् को आध्यात्मिक जीवन कह सकते हैं। जैसे हमारे पूर्ववर्ती लोगों ने, पूर्वजों ने अनेक प्रकार के उपकारों, सहयोगों द्वारा निर्बल दशा से ऊँचा उठाकर हमें बल, विद्या, बुद्धि सम्पन्न किया है, वैसे ही हमारा भी कर्त्तव्य है कि संसार में अपनी अपेक्षा किसी भी दृष्टि से जो लोग पिछड़े हुए हैं, उन्हें सहयोग देकर ऊँचा उठाएँ, सामाजिक जीवन को मधुर बनाएँ ।देश, जाति और समाज के प्रति अपने कर्त्तव्य का पालन करें; यही पितृऋण से, पूर्ववर्ती लोगों के उपकारों से उऋण होने का मार्ग है। व्यक्तिगत जीवन को शारीरिक, बौद्धिक और आर्थिक शक्तियों से सुसम्पन्न बनाना अपने को मनुष्य जाति का सदस्य बनाना ऋषि- ऋण से छूटना है। स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिन्तन, निदिध्यासन आदि आध्यात्मिक साधनाओं द्वारा काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर आदि अपवित्रताओं को हटाकर आत्मा को परम निर्मल, देवतुल्य बनाना यह देव-ऋण से उऋण होना है।

दार्शनिक दृष्टि से विचार करने पर तम का अर्थ होता है-शक्ति, रज का अर्थ होता है-साधन, सत् का अर्थ होता है-ज्ञान। इन तीनों की न्यूनता एवं विकृत अवस्था बन्धन कारक अनेक उलझनों, कठिनाइयों और बुराइयों को उत्पन्न करने वाली होती है; किन्तु जब तीनों की स्थिति सन्तोषजनक होती है, तब त्रिगुणातीत अवस्था प्राप्त होती है। हमको भली प्रकार यह समझ लेना चाहिए कि परमात्मा की सृष्टि में कोई भी शक्ति या पदार्थ दूषित अथवा भ्रष्ट नहीं है। यदि उसका सदुपयोग किया जाए तो वह कल्याणकारी सिद्ध होगा।

आत्मिक क्षेत्र में सूक्ष्म अन्वेषण करने वाले ऋषियों ने यह पाया है कि तीन गुण, तीन शरीरों, तीन क्षेत्रों का व्यवस्थित या अव्यवस्थित होना अदृश्य केन्द्रों पर निर्भर रहता है। सभी दशाओं को उत्तम बनाने से ये केन्द्र उन्नत अवस्था में पहुँच सकते हैं। दूसरा उपाय यह भी है कि अदृश्य केन्द्रों को आत्मिक साधना-विधि से उन्नत अवस्था में ले जाएँ तो स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण शरीर को ऐसी स्थिति पर पहुँचाया जा सकता है जहाँ उनके लिए कोई बन्धन या उलझन शेष रहे।

साधक जब विज्ञानमय कोश की स्थिति में होता है तो उसे ऐसा अनुभव होता है मानो उसके भीतर तीन कठोर, गठीली, चमकदार, हलचल करती हुई हलकी गाँठें हैं। इनमें से एक गाँठ मूत्राशय के समीप, दूसरी आमाशय के ऊर्ध्व भाग में और तीसरी मस्तिष्क के मध्य केन्द्र में विदित होती है। इन गाँठों में से मूत्राशय वाली ग्रन्थि को रुद्र-ग्रन्थि, आमाशय वाली को विष्णु-ग्रन्थि और शिर वाली को ब्रह्मग्रन्थि कहते हैं। इन्हीं तीनों को दूसरे शब्दों में महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती भी कहते हैं।

इन तीन महाग्रन्थियों की दो सहायक ग्रन्थियाँ भी होती हैं, जो मेरुदण्ड स्थित सुषुम्ना नाड़ी के मध्य में रहने वाली ब्रह्मनाड़ी के भीतर रहती हैं। इन्हें चक्र भी कहते हैं। रुद्रग्रन्थि की शाखा ग्रन्थियाँ मूलाधार चक्र और स्वाधिष्ठान कहलाती हैं। विष्णु -ग्रन्थि की दो शाखाएँ मणिपूरक चक्र और अनाहत चक्र हैं। मस्तिष्क में निवास करने वाली ब्रह्मग्रन्थि के सहायक ग्रन्थि-चक्रों को विशुद्धिचक्र और आज्ञाचक्र कहा जाता है। हठयोग की विधि से षट्चक्रों का वेधन किया जाता है। इन षट्चक्र वेधन की विधि के सम्बन्ध में इस पुस्तक में पहले से ही हम काफी प्रकाश डाल चुके हैं। उसकी पुनरावृत्ति करने की आवश्यकता नहीं। जिन्हें हठयोग की अपेक्षा गायत्री की पञ्चमुखी साधना के अन्तर्गत विज्ञानमय कोश में ग्रन्थिभेद करना है, उन्हीं के लिए आवश्यक जानकारी देने का यहाँ प्रयत्न किया जाएगा।

रुद्रग्रन्थि का आकार बेर के समान ऊपर को नुकीला, नीचे को भारी, पैंदे में गड्ढा लिए होता है; इसका वर्ण कालापन मिला हुआ लाल होता है। इस ग्रन्थि के दो भाग हैं। दक्षिण भाग को रुद्र और वाम भाग को काली कहते हैं। दक्षिण भाग के अन्तरंग गह्वर में प्रवेश करके जब उसकी झाँकी की जाती है, तो ऊर्ध्व भाग में श्वेत रंग की छोटी-सी नाड़ी हलका-सा श्वेत रस प्रवाहित करती है; एक तन्तु तिरछा पीत वर्ण की ज्योति-सा चमकता है। मध्य भाग में एक काले वर्ण की नाड़ी साँप की तरह मूलाधार से लिपटी हुई है। प्राणवायु का जब उस भाग से सम्पर्क होता है, तो डिम-डिम जैसी ध्वनि उसमें से निकलती है। रुद्रग्रन्थि की आन्तरिक स्थिति की झाँकी करके ऋषियों ने रुद्र का सुन्दर चित्र अंकित किया है। मस्तक पर गंगा की धारा, जटा में चन्द्रमा, गले में सर्प, डमरू की डिम-डिम ध्वनि, ऊर्ध्व भाग में त्रिशूल के रूप में अंकित करके भगवान् शंकर का ध्यान करने लायक एक सुन्दर चित्र बना दिया। उस चित्र में आलंकारिक रूप से रुद्रग्रन्थि की वास्तविकताएँ ही भरी गई हैं। उस ग्रन्थि का वाम भाग जिस स्थिति में है, उसी के अनुरूप काली का सुन्दर चित्र सूक्ष्मदर्शी आध्यात्मिक चित्रकारों ने अंकित कर दिया है।

विष्णुग्रन्थि किस वर्ण की, किस गुण की, किस आकार की, किस आन्तरिक स्थिति की, किस ध्वनि की, किस आकृति की है, यह सब हमें विष्णु के चित्र से सहज ही प्रतीत हो जाता है। नील वर्ण, गोल आकार, शंख-ध्वनि, कौस्तुभ मणि, वनमाला यह चित्र उस मध्यग्रन्थि का सहज प्रतिबिम्ब है।

जैसे मनुष्य को मुख की ओर से देखा जाए तो उसकी झाँकी दूसरे प्रकार की होती है और पीठ की ओर से देखा जाए, तब यह आकृति दूसरे ही प्रकार की होती है। एक ही मनुष्य के दो पहलू दो प्रकार के होते हैं। उसी प्रकार एक ही ग्रन्थि दक्षिण भाग से देखने में पुरुषत्व प्रधान आकार की और बाईं ओर से देखने पर स्त्रीत्व प्रधान आकार की होती है। एक ही ग्रन्थि को रुद्र या शक्तिग्रन्थि कहा जा सकता है। विष्णु-लक्ष्मी, ब्रह्मा और सरस्वती का संयोग भी इसी प्रकार है।

ब्रह्मग्रन्थि मध्य मस्तिष्क में है। इससे ऊपर सहस्रार शतदल कमल है। यह ग्रन्थि ऊपर से चतुष्कोण और नीचे से फैली हुई है। इसका नीचे का एक तन्तु ब्रह्मरन्ध्र से जुड़ा हुआ है। इसी को सहस्रमुख वाले शेषनाग की शय्या पर लेटे हुए भगवान् की नाभि कमल से उत्पन्न चार मुख वाला ब्रह्मा चित्रित किया गया है। वाम भाग में यही ग्रन्थि चतुर्भुजी सरस्वती है। वीणा की झंकार-से ओंकार ध्वनि का यहाँ निरन्तर गुञ्जार होता है।

यह तीनों ग्रन्थियाँ जब तक सुप्त अवस्था में रहती हैं, बँधी हुई रहती हैं, तब तक जीव साधारण दीन-हीन दशा में पड़ा रहता है। अशक्ति, अभाव और अज्ञान उसे नाना प्रकार से दु: देते रहते हैं। पर जब इनका खुलना आरम्भ होता है तो उनका वैभव बिखर पड़ता है। मुँह बन्द कली में रूप है, सौन्दर्य और आकर्षण। पर जब वह कली खिल पड़ती है और पुष्प के रूप में प्रकट होती है, तो एक सुन्दर दृश्य उपस्थित हो जाता है। जब तक खजाने का ताला लगा हुआ है, थैली का मुँह बन्द है, तब तक दरिद्रता दूर नहीं हो सकती; पर जैसे ही रत्नराशि का भण्डार खुल जाता है, वैसे ही अतुलित वैभव का स्वामित्व प्राप्त हो जाता है।

रात को कमल का फूल बन्द होता है तो भौंरा भी उसमें बन्द हो जाता है, पर प्रात:काल वह फूल फिर खिलता है तो भौंरा बन्धन-मुक्त हो जाता है। ये तीन कलियाँ, तीन-तीन ग्रन्थियाँ, जीव को बाँधे हुए हैं। जब ये खुल जाती हैं तो मुक्ति का अधिकार स्वयमेव ही प्राप्त हो जाता है। इन रत्न-राशियों का ताला खुलते ही शक्ति, सम्पन्नता और प्रज्ञा का अटूट भण्डार हस्तगत हो जाता है।

चिड़िया अपनी छाती की गरमी से अण्डों को पकाती है, चूल्हे की गर्मी से भोजन पकता है, सूर्य की गर्मी से वृक्षों, वनस्पतियों और फलों का परिपाक होता है। माता नौ महीने तक बालक को पेट में पकाकर उसको इस स्थिति में लाती है कि वह जीवन धारण कर सके। विज्ञानमय कोश की ये तीनों -ग्रन्थियाँ भी तप की गर्मी से पकती हैं। तप द्वारा ब्रह्मा, विष्णु, महेश, सरस्वती, लक्ष्मी, काली सभी का परिपाक हो जाता है। ये शक्तियाँ समदर्शी हैं; उन्हें किसी से प्रेम है, द्वेष। रावण जैसे असुरों ने भी शंकर जी से वरदान पाए थे और अनेक सुर भी कोई सफलता नहीं प्राप्त कर पाए। इसमें साधक का पुरुषार्थ ही प्रधान है। श्रम और प्रयत्न ही परिपक्व होकर सफलता बन जाते हैं।

रुद्र, विष्णु और ब्रह्म ग्रन्थियों को खोलने के लिए ग्रन्थि के मूल भाग में निवास करने वाली बीज शक्तियों का सञ्चार करना पड़ता है। रुद्रग्रन्थि के अधोभाग में बेर के डण्ठल की तरह एक सूक्ष्म प्राण अभिप्रेत होता है, उसेक्लींबीज कहते हैं। विष्णुग्रन्थि के मूल मेंश्रींका निवास है और ब्रह्मग्रन्थि के नीचेह्रींतत्त्व का अवस्थान है। मूलबन्ध बाँधते हुए एक ओर से अपान और दूसरी ओर से कूर्मप्राण को चिमटे की तरह बनाकर रुद्रग्रन्थि को पकड़कर  रेचक प्राणायाम द्वारा दबाते हैं। इस दबाव की गर्मी से क्लीं बीज जाग्रत् हो जाता है। वह नोकदार डण्ठल आकृति का बीज अपनी ध्वनि और रक्त वर्ण प्रकाश-ज्योति के साथ स्पष्ट रूप से परिलक्षित होने लगता है।

इस जाग्रत् क्लीं बीज की अग्रिम नोंक से कुंचुकि क्रिया की जाती है, जैसे किसी वस्तु में छेद करने के लिए नोंकदार कील कोंची जाती है; इस प्रकार की वेधन-साधना कोकुंचुकी क्रियाकहते हैं। रुद्रग्रन्थि के मूल केन्द्र में क्लीं बीज की अग्र शिखा से जब निरन्तर कुंचुकी होती है, तो प्रस्तुत कलिका में भीतर ही भीतर एक विशेष प्रकार के लहलहाते हुए तड़ित प्रवाह उठाने पड़ते हैं; इनकी आकृति एवं गति सर्प जैसी होती है। इन तड़ित प्रवाहों को ही शम्भु के गले में फुफकारने वाले सर्प बताया है। जिस प्रकार ज्वालामुखी पर्वत के उच्च शिखर पर धूम्र मिश्रित अग्नि निकलती है, उसी प्रकार रुद्रग्रन्थि के ऊपरी भाग में पहले क्लीं बीज की अग्निजिह्वा प्रकट होती है। इसी को काली की बाहर निकली हुई जीभ माना गया है। इसको शम्भु का तीसरा नेत्र भी कहते हैं।

मूलबन्ध, अपान और कूर्म प्राण के आघात से जाग्रत् हुई क्लीं बीज की कुंचुकी -क्रिया से धीरे-धीरे रुद्रग्रन्थि शिथिल होकर वैसे ही खुलने लगती है, जैसे कली धीरे-धीरे खिलकर फूल बन जाती है। इस कमल पुष्प के खिलने को पद्मासन कहा गया है। त्रिदेव के कमलासन पर विराजमान होने के चित्रों का तात्पर्य यही है कि वे विकसित रूप से परिलक्षित हो रहे हैं।

साधक के प्रयत्न के अनुरूप खुली हुई रुद्रग्रन्थि का तीसरा भाग जब प्रकटित होता है, तब साक्षात् रुद्र का, काली का अथवा रक्त वर्ण सर्प के समान लहलहाती हुई, क्लीं-घोष करती हुई अग्नि शिखा का साक्षात्कार होता है। यह रुद्र जागरण साधक में अनेक प्रकार की गुप्त-प्रकट शक्तियाँ भर देता है। संसार की सब शक्तियों का मूल केन्द्र रुद्र ही है। उसे रुद्रलोक या कैलाश भी कहते हैं। प्रलय काल में संसार संचालिनी शक्ति व्यय होते-होते पूर्ण शिथिल होकर जब सुषुप्त अवस्था में चली जाती है, तब रुद्र का ताण्डव नृत्य होता है। उस महामन्थन से इतनी शक्ति फिर उत्पन्न हो जाती है जिससे आगामी प्रलय तक काम चलता रहे। घड़ी में चाबी भरने के समान रुद्र का प्रलय ताण्डव होता है। रुद्रशक्ति की शिथिलता से जीवों की तथा पदार्थों की मृत्यु हो जाती है, इसलिए रुद्र को मृत्यु का देवता माना गया है।

विष्णुग्रन्थि को जाग्रत् करने के लिए जालन्धर बन्ध बाँधकरसमानऔरउदानप्राणों द्वारा दबाया जाता है, तो उसके मूल भाग काश्रींबीज जाग्रत् होता है। यह गोल गेंद की तरह है और इसकी अपनी धुरी पर द्रुत गति से घूमने की क्रिया होती है। इस घूर्णन क्रिया के साथ-साथ एक ऐसी सनसनाती हुई सूक्ष्म ध्वनि होती है, जिसको दिव्य श्रोत्रों सेश्रींजैसे सुना जाता है।

श्रीं बीज को विष्णुग्रन्थि की बाह्य परिधि में भ्रामरी क्रिया के अनुसार घुमाया जाता है। जैसे पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है, उसी प्रकार परिभ्रमण करने को भ्रामरी कहते हैं। विवाह में वर-वधू की भाँवर या फेरे पड़ना, देव-मन्दिरों तथा यज्ञ की परिक्रमा या प्रदक्षिणा होना भ्रामरी क्रिया का रूप है। विष्णु की उँगली पर घूमता हुआ चक्र सुदर्शन चित्रित करके योगियों ने अपनी सूक्ष्म दृष्टि से अनुभव किए गए इसी रहस्य को प्रकट किया है।श्रींबीज विष्णुग्रन्थि की भ्रामरी गति से परिक्रमा करने लगता है, तब उस महातत्त्व का जागरण होता है।

पूरक प्राणायाम की प्रेरणा देकर समान और उदान द्वारा जाग्रत् किए गए श्रीं बीज से जब विष्णुग्रन्थि के बाह्य आवरण की मध्य परिधि में भ्रामरी क्रिया की जाती है, तो उसके गुञ्जन से उसका भीतरी भाग चैतन्य होने लगता है। इस चेतना की विद्युत् तरंगें इस प्रकार उठती हैं जैसे पक्षी के पंख दोनों बाजुओं में हिलते हैं। उसी गति के आधार पर विष्णु का वाहन गरुड़ निर्धारित किया गया है।

इस साधना से विष्णुग्रन्थि खुलती है और साधक की मानसिक स्थिति के अनुरूप विष्णु, लक्ष्मी या पीत वर्ण की अग्निशिखा की लपटों के समान ज्योतिपुञ्ज का साक्षात्कार होता है। विष्णु का पीताम्बर इस पीत ज्योतिपुञ्ज का प्रतीक है। इस ग्रन्थि का खुलना ही बैकुण्ठ, स्वर्ग एवं विष्णुलोक को प्राप्त करना है। बैकुण्ठ या स्वर्ग को अनन्त ऐश्वर्य का केन्द्र माना जाता है। वहाँ सर्वोत्कृष्ट सुख-साधन जो सम्भव हो सकते हैं, वे प्रस्तुत हैं। विष्णुग्रन्थि वैभव का केन्द्र है, जो उसे खोल लेता है, उसे विश्व के ऐश्वर्य पर पूर्ण अधिकार प्राप्त हो जाता है।

ब्रह्म ग्रन्थि मस्तिष्क के मध्य भाग में सहस्रदल कमल की छाया में अवस्थित है। उसे अमृत कलश कहते हैं। बताया गया है कि सुरलोक में अमृत कलश की रक्षा सहस्र फनों वाले शेषनाग करते हैं। इसका अभिप्राय इसी ब्रह्म ग्रन्थि से है।

उड्डियान बन्ध लगाकर व्यान और धनञ्जय प्राणों द्वारा ब्रह्मग्रन्थि को पकाया जाता है। पकाने से उसके मूलाधार में वास करने वाली ह्रीं शक्ति जाग्रत् होती है। इसकी गति को प्लावनी कहते हैं। जैसे जल में लहरें उत्पन्न होती हैं और निरन्तर आगे को ही लहराती हुई चलती हैं, उसी प्रकार ह्रीं बीज की प्लावनी गति से ब्रह्मग्रन्थि को दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर प्रेरित करते हैं। चतुष्कोण ग्रन्थि के ऊर्ध्व भाग में यही ह्रीं तत्त्व रुक-रुककर गाँठें सी बनाता हुआ आगे की ओर चलता है और अन्त में परिक्रमा करके अपने मूल संस्थान को लौट आता है।

गाँठ बाँधते चलने की नीची-ऊँची गति के आधार पर माला के दाने बनाए गए हैं। १०८ दचके लगाकर तब एक परिधि पूरी होती है, इसलिए माला के १०८ दाने होते हैं। इस ह्रीं तत्त्व की तरंगें मन्थर गति से इस प्रकार चलती हैं जैसे हंस चलता है। ब्रह्मा या सरस्वती का वाहन हंस इसीलिए माना गया है। वीणा के तारों की झंकार से मिलती-जुलतीह्रींध्वनि सरस्वती की वीणा का परिचय देती है।

कुम्भक प्राणायाम की प्रेरणा से ह्रीं बीज की प्लावनी क्रिया आरम्भ होती है। यह क्रिया निरन्तर होते रहने पर ब्रह्मग्रन्थि खुल जाती है। तब उसका ब्रह्म के रूप में, सरस्वती के रूप में अथवा श्वेत वर्ण प्रकम्पित शुभ्र ज्योति शिखा के समान साक्षात्कार होता है। यह स्थिति आत्मज्ञान, ब्रह्मप्राप्ति, ब्राह्मी स्थिति की है। ब्रह्मलोक एवं गोलोक भी इसको कहते हैं। इस स्थिति को उपलब्ध करने वाला साधक ज्ञान-बल से परिपूर्ण हो जाता है। इसकी आत्मिक शक्तियाँ जाग्रत् होकर परमेश्वर के समीप पहुँचा देती हैं, अपने पिता का उत्तराधिकार उसे मिलता है और जीवन्मुक्त होकर ब्राह्मीस्थिति का आनन्द ब्रह्मानन्द उपलब्ध करता है।

षट्चक्र का हठयोग-सम्मत विधान अथवा महायोग का यह ग्रन्थिभेद, दोनों ही समान स्थिति के हैं। साधक अपनी स्थिति के अनुसार उन्हें अपनाते हैं, दोनों से ही विज्ञानमय कोश का परिष्कार होता है।

अनन्त आनन्द की साधना तैत्तिरीयोपनिषद् की तृतीय बल्ली (भृगु बल्ली) में एक बड़ी ही महत्त्वपूर्ण आख्यायिका आती है। उसमें पञ्चकोशों की साधना पर मार्मिक प्रकाश डाला गया है।

वरुण के पुत्र भृगु ने अपने पिता के निकट जाकर प्रार्थना की किअधीहि भगवो ब्रह्मेतिअर्थात् हे भगवन्! मुझे ब्रह्मज्ञान की शिक्षा दीजिए।

वरुण ने उत्तर दिया— ‘यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते, येन जातानि जीवन्ति, यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति, तद्विजिज्ञासस्व, तद्ब्रह्मेति।

अर्थात्- जिससे समस्त प्राणी उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर जीवित रहते हैं और अन्त में जिसमें विलीन हो जाते हैं, हे भृगु! तू उसी ब्रह्म को जानने की इच्छा कर।

पिता के आदेशानुसार पुत्र ने उस ब्रह्म को जानने के लिए तप आरम्भ कर दिया। दीर्घकालीन तप के उपरान्त भृगु नेअन्नमय जगत्’ (स्थूल संसार) में फैली ब्रह्म- विभूति को जान लिया और वह पिता के पास पहुँचा।

वरुण ने भृगु से फिर कहा—‘तपसो ब्रह्म विजिज्ञासस्व तपो ब्रह्मेतिअर्थात् हे पुत्र! तू तप करके ब्रह्म को जानने का प्रयत्न कर, क्योंकि ब्रह्म को तप द्वारा ही जाना जाता है।

भृगु ने फिर तपस्या की औरप्राणमय जगत्की ब्रह्म- विभूति को जान लिया। फिर वह पिता के पास पहुँचा, तो वरुण ने पुनः उसे तप द्वारा ब्रह्म को जानने का उपदेश दिया।

पुत्र ने पुनः कठोर तप किया औरमनोमय जगत्की ब्रह्म- विभूति का अभिज्ञान प्राप्त कर लिया। पिता ने उसे फिर तप में लगा दिया। अब उसनेविज्ञानमय जगत्की ईश्वरीय विभूति को प्राप्त कर लिया। अन्त में पाँचवीं बार भी पिता ने उसे तप में ही प्रवृत्त किया और भृगु ने उस आनन्दमयी विभूति को भी उपलब्ध कर लिया।

    ‘आनन्दमय जगत्की अन्तिम सीढ़ी पर पहुँचने से किस प्रकार पूर्ण ब्रह्मज्ञान प्राप्त होता है, इसका वर्णन करते हुएतैत्तिरीयोपनिषद्की तृतीय वल्ली के छठवे मन्त्र में बताया गया है

आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्। आनन्दाद्ध्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते। आनन्देन जातानि जीवन्ति। आनन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति। सैषा भार्गवी वारुणी विद्या। परमेव्योमन् प्रतिष्ठिता।

अर्थात् उस (भृगु) ने जाना कि आनन्द ही ब्रह्म है। आनन्द से ही सब प्राणी उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर आनन्द में ही जीवित रहते हैं और अन्त में आनन्द में ही विलीन हो जाते हैं।

उपनिषद्कार ने उपरोक्त आख्यायिका में ब्रह्मानन्द, परमानन्द, आत्मानन्द में ही ब्रह्मज्ञान का अन्तिम लक्ष्य बताया है। आनन्दमय जगत् के कोश में पहुँचने के लिए तप करने का संकेत किया है। कोशों की सीढ़ियाँ जैसे- जैसे पार होती जाती हैं, वैसे ही वैसे ब्रह्म की उपलब्धि निकट आती जाती है। आगे बताया कि

एवंवित् अस्माल्लोकात्प्रेत्य। ऐतमन्नमयमात्मानमुपसंक्रामति, एतं प्राणमयमात्मानमुपसंक्रामति, एतं मनोमयमात्मानमुपसंक्रामति, एतं विज्ञानमयमात्मानमुपसंक्रामति, एतमानन्दमयमात्मानमुपसंक्रामति। इमाँल्लोकान्कामान्नी कामरूप्यनुसञ्चरन्। एतत्सामगायन्नास्ते।

अर्थात्- इस प्रकार जो मनुष्य ब्रह्मज्ञान को प्राप्त कर लेता है, वह इस अन्नमय कोश को पार कर, इस प्राणमय कोश को पार कर, इस मनोमय कोश को पार कर, इस विज्ञानमय कोश को पार कर, इस आनन्दमय कोश को पार कर इच्छानुसार भोगवाला और इच्छानुसार रूपवाला हो जाता है तथा इन सब लोकों में विचरता हुआ इस साम का गायन करता रहता है।

जीवन इसलिए है कि ब्रह्मरूपी आनन्द को प्राप्त किया जाए, इसलिए कि पग- पग पर अभाग्य, दुःख- दारिद्र्य और दुर्भाग्य का अनुभव किया जाए। जीवन को लोग सांसारिक सुविधाओं के संचय में लगाते हैं, पर उनके भोगने से पूर्व ही ऐसी समस्याएँ उठ खड़ी होती हैं कि वह अभिलषित सुख जब प्राप्त होता है, उसमें कुछ सुख नहीं रह जाता; सारा प्रयत्न मृगतृष्णावत् व्यर्थ गया मालूम देता है।

संसार के पदार्थों में जितना सुख है, उससे अधिक गुना सुख आत्मिक उन्नति में है। स्वस्थ पञ्चकोशों से सम्पन्न आत्मा जब अपने वास्तविक स्वरूप में पहुँचता है, तो उसे अनिर्वचनीय आनन्द प्राप्त होता है। यह अनुभव होता है कि ब्राह्मी स्थिति का क्या मूल्य और क्या महत्त्व है? संसार के क्षुद्र सुखों की अपेक्षा असंख्य गुने सुखआत्मानन्दके लिए अधिकतम त्याग एवं तप करने में किसी प्रकार का संकोच क्यों हो? विज्ञ पुरुष ऐसा करते भी हैं।

तैत्तिरीयोपनिषद् की भृगु वल्ली में आनन्द की मीमांसा करते हुए कहा गया है कि कोई मनुष्य यदि पूर्ण स्वस्थ, सुशिक्षित, गुणवान्, सामर्थ्यवान्, सौभाग्यवान् एवं समस्त संसार की धन- संपत्ति का स्वामी हो, तो उसे जो आनन्द हो सकता है, उसे एक मानुषी आनन्द कहते हैं। उससे करोड़ों- अरबों गुने आनन्द को ब्रह्मानन्द कहते हैं। ब्रह्मानन्द का ऐसा ही वर्णन शतपथ ब्राह्मण १४///३१ में तथा वृहदारण्यक उपनिषद् //३३ में भी आया है।

पञ्चमुखी गायत्री की साधना, पञ्चकोशों की साधना है। एक- एक कोश की एक- एक ब्रह्म- विभूति है। ये ब्रह्म विभूतियाँ वे सीढ़ी हैं जो साधक को अपना सुखास्वादन कराती हुई अगली सीढ़ी पर चढ़ने के लिए अग्रसर करती हैं।

जीवन जैसी बहुमूल्य सम्पदा कीट- पतंगों की तरह व्यतीत करने के लिए नहीं है। चौरासी लक्ष योनियों में भ्रमण करते हुए नर- तन बड़ी कठिनाई से मिलता है। इसको तुच्छ स्वार्थ में नहीं, परम स्वार्थ में, परमार्थ में लगाना चाहिए। गायत्री साधना ऐसा परमार्थ है जो हमारे व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन को सुख, शान्ति और समृद्धि से भर देता है।

अगले पृष्ठों पर वेदमाता, जगज्जजननी, आदिशक्ति गायत्री के पाँचमुखों की उपासना का, आत्मा के पाँच कोशों की साधना का विधान बताया जाएगा। भृगु के समान जो इन तपश्चर्याओं को करेंगे, वे ही ब्रह्मप्राप्ति के अधिकारी होंगे।

यदि विचार किया जाए तो यह आश्चर्य और खेद का विषय है कि ऐसा साधन सुलभ होने पर भी मनुष्य केवल पेट भरने और निकृष्ट भोग करने की स्थिति में ही पड़ा रहे अथवा इससे भी नीचे उतरकर छल, कपट, चोरी, हत्या आदि जैसे जघन्य कृत्य करके नरक वास करने के दण्ड का भागी बन जाय। ईश्वर ने हमको इस कार्य भूमि में मुख्यतः इसलिए भेजा है कि हम सत्कर्म और सात्त्विकी साधना तथा उपासना करके दैवी मार्ग पर अग्रसर हों और जीवन को उच्चतर बनाते हुए अपने महान् लक्ष्य को प्राप्त करें। दैवी मार्ग को अपनाने और जीवन को शुद्ध, पवित्र, परोपकारमय बनाने में ऐसी कोई बात नहीं है जो हमारी प्रगति में बाधास्वरूप सिद्ध हो। गरीब से गरीब और सांसारिक साधनों से रहित व्यक्ति भी इसको अपना सकता है और गायत्री उपासना तथा सेवामय जीवन के द्वारा निरन्तर ऊपर की सीढ़ियों पर चढ़ता हुआ उच्चतम शिखर तक पहुँच सकता है। इसके लिए मुख्य आवश्यकता श्रद्धा, लगन, दृढ़ता आत्मविश्वास की ही है, जिसको मनुष्य अभ्यास द्वारा प्राप्त कर सकता है।

 

पंचकोशी साधना का ज्ञातव्य पिछले पृष्ठों पर पञ्चकोशी साधना के अन्तर्गत योगविद्या की वे साधनाएँ बताई गई हैं जो सर्वसाधारण के लिए सरल एवं उपयोगी हैं। यह प्रकट है कि आध्यात्मिक महातत्त्व गायत्री ही है। जितना भी ज्ञान, विज्ञान और योग है, वह सब गायत्री से आविर्भूत होता है, इसलिए ऐसी कोई साधना हो नहीं सकती जो गायत्री की महापरिधि से बाहर हो। सम्पूर्ण योगशास्त्र निश्चित रूप से गायत्री के अन्तर्गत है।

योग साधनाएँ अनेक हैं। वे सब एक ही महातत्त्व की प्राप्ति के लिए हैं। गायत्री का नाम हीमुक्तिहै और उसी को सिद्धि कहते हैं। जैसे किसी नगर मे पहुँचने के लिए अनेक दिशाओं के अनेक रास्ते होते हैं, उसी प्रकार प्रभु प्राप्ति के लिए अनेक योग हैं। प्रत्येक मार्ग में अलग-अलग प्रकार के दृश्य, पदार्थ और मनुष्य मिलते हैं। इनको ध्यान में रखते हुए लोग निर्दिष्ट स्थान पर पहुँचने का मार्ग निर्धारित करते हैं। इसी प्रकार प्रत्येक योग साधना की यह विशेषता है कि उसके मार्ग में अपने-अपने ढंग के अनोखे-अनोखे अनुभव होते हैं, भिन्न-भिन्न सिद्धियाँ एवं अनुभूतियाँ प्राप्त होती हैं। अन्त में पहुँचते सब एक ही स्थान पर हैं।

योग साधनाएँ अनेक प्रकार की इसलिए हैं कि मनोभूमि, स्थिति, शक्ति, सुविधा, रुचि, देश, काल, पात्र के भेद से भिन्न-भिन्न परिस्थिति के लोग उन्हें अपना सकें। युग परिवर्तन के अनुसार तत्त्वों की स्थिति में अन्तर आता रहता है। पूर्वकाल में जलवायु में जो गुण था, वह अब नहीं है; जो अब है, वह आगे रहेगा। सृष्टि धीरे-धीरे बूढ़ी होती जाती है। बालक में जितनी स्फूर्ति, कोमलता, चञ्चलता, उमंग और सुन्दरता होती है, वह बूढ़े में नहीं रहती। जवान आदमी जितना बोझ उठा सकता है, उतना वृद्ध पुरुष के लिए सम्भव नहीं।

सतयुग सृष्टि का बालकपन है, त्रेता जवानी, द्वापर अधेड़ावस्था है तो कलियुग बुढ़ापा। पञ्चतत्त्वों की यही स्थिति होती है। जब बुढ़ापा अधिक जाता है तो सृष्टि मर जाती है, प्रलय हो जाती है। फिर उसका नया जन्म होता है। सतयुग के बालक-पञ्चतत्त्वों में प्राणियों के शरीर भी वैसे ही थे। खाद्य पदार्थ तथा जलवायु में भी वैसी ही विशेषता थी। मानसिक चेतना, इन्द्रिय लालसा, आहार-विहार, आयु एवं शरीर के ढाँचा का, गर्मी तथा वायु के भी युग-प्रभाव से बहुत कुछ सम्बन्ध रहता है।

भूगर्भ विज्ञान के अन्वेषकों ने कुछ हजार वर्ष पुराने ऐसे जीव-जन्तुओं के प्रमाण पाए हैं, जो वर्तमान जीवों की अपेक्षा कहीं भिन्न आकृति के और कहीं अधिक बड़े थे। ऐसे मनुष्यों के अस्थि-पञ्जर मिले हैं जो दस फीट लम्बे थे। महागज, महामकर और महाशूकर अपने वर्तमान वंशजों की अपेक्षा पाँच गुने से लेकर सैंतीस गुने तक बड़े थे, ऐसे प्रमाण मिल चुके हैं। जिस प्रकार सूर्यकाल में अग्नि तत्त्व प्रधान शरीर वाले प्राणी रहते हैं, उसी प्रकार सतयुग में आकाश तत्त्व की प्रधानता इस